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Tuesday, September 3, 2013

सूरदास--दाऊ बहुत खिझायौ।

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायौ।

मोसों कहत मोल कौ लीन्हौ,
तू जसुमति कब जायौ॥

कहा कहौं इहिं रिस के मारे 
खेलत हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता 
को है तेरो तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी 
तू कत स्याम सरीर।
चुटकी दै दै हंसत ग्वाल सब  
सिखै देत बलबीर॥
तू मोहीं कों मारन सीखी 
दाऊ कबहुं न खीझै॥

मोहन-मुख रिस की ये बातें 
जसुमति सुनि-सुनि रीझै॥
सुनहु कान्ह बलभद्र चबा 
जनमत ही कौ धूत।
सूर श्याम मोहिं गोधन की सौं 
हौं माता तू पूत॥९॥



'सूरदास'-मेरो मन अनत ...

मेरो मन 
अनत कहाँ सुख पावे।
जैसे उड़ि जहाज की पंछि, 
फिरि जहाज पर आवै॥
मेरो मन अनत... 

कमल-नैन को छाँड़ि महातम, 
और देव को ध्यावै।
मेरो मन अनत... 

परम गंग को छाँड़ि पियसो, 
दुरमति कूप खनावै॥
मेरो मन अनत... 

जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, 
क्यों करील-फल खावै।
मेरो मन अनत... 

'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, 
छेरी कौन दुहावै॥
मेरो मन अनत... 

सूरदास--मो सम कौन कुटिल...

मो सम कौन कुटिल खल कामी। 

जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ,
ऐसौ नोनहरामी॥ 

भरि भरि उदर विषय कों धावौं,
जैसे सूकर ग्रामी। 

हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की
निसदिन करत गुलामी॥ 

पापी कौन बड़ो है मोतें, 
सब पतितन में नामी। 

सूर, पतित कों ठौर कहां है,
सुनिए श्रीपति स्वामी॥ 

कबीर :गुरु बिन कौन बतावे बाट..

गुरु बिन कौन बतावे बाट, 
बड़ा विकट यम घाट,

भ्रान्ति की पहाड़ी नदिया 
बीच में, अहंकार की लाट

काम क्रोध दो परबत ठाढ़े ,
लोभ, चोर,संघात

मद मच्छर का मेह बरसत 
माया पवन बहकात 

कहत कबीर सुनो भई साधो,
शंकर आये घाट,

बड़ा विकट यम घाट। 
गुरु बिन कौन बतावे बाट।